Garam masala

शरीर को स्वस्थ रखने के लिए प्रोटीन, कॉर्बोहाइड्रेट, वसा ,खनिज पदार्थ और जल की आवश्यकता होती है। इन तत्वों के संतुलित सेवन से शरीर स्वस्थ बना रहता है। यह ध्यान रखना चाहिये कि एक तत्व की कमी कभी भी कोई दूसरा तत्व पूर्ण नहीं कर सकता हैं। इसलिए इन तत्वों का सदैव संतुलित रूप से सेवन करना चाहिए। इनका महत्व और प्राप्ति खाद्य निम्नलिखित हैं। प्रोटीन (Protien) – यह शरीर की कोशिकाओं एवं उतकों (cells & tissues) के निर्माण और उसके टूट फूट को ठीक करने वाला मुख्य तत्व हैं। कैलोरीज की कमी होने पर यह उसे भी पूरा करता हैं। शरीर के उचित विकास के लिए यह बहुत आवश्यक है। इसलिए यह बच्चों और किशोरो के लिए यह बहुत जरूरी है। यह बढ़ती हुई आयु में मास बनाते हैं, और आयु भर शरीर को स्वस्थ रखतें हैं। प्रोटीन हमें समस्त प्रकार के द्विदल अन्न जैसे विभिन्न प्रकार की दालें,…

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भोजन सदैव ताजा, सुपाच्य, मधुर, हल्का और चिकनाईयुक्त होना चाहिए। यह आयु, बुद्धि, बल, निरोगता, सुख और प्रीति को बढ़ाने वाला होता है। कहा गया है कि जैसा अन्न वैसा मन। नाश्ता और भोजन एक निश्चित समय पर ही करना चाहिए। इससे उस समय विशेष पर स्वयं ही भूख लगने लगती है और स्वास्थ्य उन्नत रहता है। सदैव खुल कर भूख लगने पर ही भोजन करना चाहिए। यदि भूख नहीं लगी है तो नाश्ता और भोजन का समय होने पर भी कुछ खाना नहीं चाहिए। हाँ, उस समय आप ताजे पानी में नीबू का रस मिला कर पी सकते हैं। भूख से सदैव एक रोटी कम खानी चाहिए। इससे हमारा पाचन तंत्र हमेशा शक्तिशाली बना रहता है। भोजन करने पर शरीर की सारी शक्ति खिच कर भोजन पचाने में लग जाती है। इसी तरह अधिक भोजन करने पर हमारा शरीर भारी और आलस्य युक्त हो जाता है। भूख से कम…

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bhojan

शरीर को स्वस्थ अथवा अस्वस्थ रखने में भोजन का महत्वपूर्ण योगदान है। इसीलिये कहा गया है कि भोजन अमृत भी है और विष भी है। यह सदैव ध्यान में रखना चाहिये कि भोजन हमारे लिये है, न कि हम भोजन के लिये। यदि शरीर में कोई रोग है तो वह मात्र उपवास और भोजन सुधार से ही ठीक हो जाते हैं। वहीं स्वस्थ व्यक्ति भोजन में अनियमितता प्रारम्भ कर दे तो शरीर रुग्ण हो जाता है। इससे सिद्ध होता है कि भोचजन अमृत भी है और विष भी।एक बार खाद्यान्न संकट पर पं0 जवाहर लाल नेहरू ने कहा था कि हमारे देश में जितने मनुष्य भूखे मरते हैं उससे कहीं अधिक, अधिक भोजन करने से मरते हैं। प्रायः देखा जाता है कि लोग स्वाद के लिये मिर्च, मसालेदार भोजन करते हैं, जो हमारे स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है। वास्तव में सादे भोजन का एक अलग ही स्वाद होता है…

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सभी प्रकार के लौकिक एवं पारलौकिक सुख प्राप्त करने के लिए ध्यान एक प्रमुख साधन है। गीता में भगवान ने नौ प्रकार की भक्ति बतलायी है जिसमें ध्यान भी एक भक्ति है। चाहे हम मंत्र जाप कर रहे हों, सत्संग सुन रहें या भगवान का कीर्तन कर रहें हों और मन कहीं और है तो हमें उसका लाभ नहीं मिलेगा। मन भटकने का अर्थ है ध्यान न लगना। इसलिये सत्संग, कीर्तन, सेवा कार्य या किसी भी प्रकार के कार्य में ध्यान लगना आवश्यक है। संसार के जितने भी अविष्यकार हुये हैं वे सब ध्यान के माध्यम से ही हुये हैं। इससे सिद्ध होता है कि ध्यान ही उन्नति का मूल है। इसलिये हमें ध्यान अवश्य करना चाहिये, वैसे तो ध्यान हम कभी भी कर सकते हैं परन्तु प्रातःकाल का समय सर्वोत्तम होता है। ध्यान लगाने के लिये स्नानादि क्रिया से निवृत्त होकर चित्रानुसार बैठ जायें। संभव हो तो पद्यमासान या…

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व्यायाम आदि से निवृत होकर सर्वप्रथम स्नान करना चाहिए। हमें प्रतिदिन स्नान करना चाहिए। किसी विद्वान ने कहा- ‘‘शतं विहाय भोक्तच्यं सहस्त्रं स्नानमाचरेत्।लक्षंविहाय दातव्यं कोटि व्यक्त्वा प्रभुं भजेत्।।‘‘ अर्थात सौ काम छोड़कर भोजन करे और हजार काम छोड़कर स्नान करे। लाख काम छोड़कर दान करे और करोड़ काम छोड़कर प्रभु का भजन करे। इसलिए प्रतिदिन स्नान अवश्य करना चाहिए। नहाने के लिए हैण्डपम्प, कुंआ अथवा ट्यूबबेल का पानी उत्तम होता है। क्योंकि ये पानी मौसम के अनुसार अपना तापक्रम बनाये रखते है। और शरीर में रक्त संचालन संतुलित रखते है। स्काटलैण्ड की 140 वर्षीय मरियम नाम की महिला प्रतिदिन प्रातः ठण्डे पानी से स्नान करती थी और इसके बाद वह चार मील बिना रुके टहलने को जाती थी। इस कारण वह इतनी अधिक उम्र में भी कभी बीमार नहीं पडी और दीर्घ जीवन प्राप्त किया। इसलिए शरीर को स्वच्छ, पवित्र और निरोग रखने के लिए प्रतिदिन स्नान करना परम आवश्यक…

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शरीर को स्वच्छ एवं स्वस्थ रखने के लिए ईश्वर ने चार मार्ग बनाये है। ये फेफड़े, वृक्क (गुर्दा), त्वचा एवं आंत है।प्रत्येक अंग विशेष ढ़ग से अपना कार्य करते है। शरीर के ये अंग मल विर्सजन का कार्य करते है। फेफडे़ शरीर का दूषित वायु बहार फेकते है और शुद्ध वायु ग्रहण करते है,जबकि वृक्क मूत्र रुप में शरीर के दूषित पदार्थ उत्सर्जित करते है। त्वचा पसीने के रुप में और बड़ी आंते मल के रुप में शरीर केे विजातीय द्रव्य का विसर्जन करते है। कुछ अवस्थाओं में ये स्वच्छता के मार्ग एक दूसरेेे पर अवलंबित रहते है। जैसे त्वचा और वृक्क। हम देखते है कि जाड़े की तुलना में गर्मी के दिनों में पेशाब कम होता है। क्योंकि शरीर के दूषित जल का कुछ अंश पसीने के रुप में बाहर निकल जाता है, वहीं जाडे़ में पसीना न निकलने के कारण वृक्कों को मूत्र मार्ग का सहारा लेना पड़ता…

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