ध्यान

ध्यान

सभी प्रकार के लौकिक एवं पारलौकिक सुख प्राप्त करने के लिए ध्यान एक प्रमुख साधन है। गीता में भगवान ने नौ प्रकार की भक्ति बतलायी है जिसमें ध्यान भी एक भक्ति है। चाहे हम मंत्र जाप कर रहे हों, सत्संग सुन रहें या भगवान का कीर्तन कर रहें हों और मन कहीं और है तो हमें उसका लाभ नहीं मिलेगा। मन भटकने का अर्थ है ध्यान न लगना। इसलिये सत्संग, कीर्तन, सेवा कार्य या किसी भी प्रकार के कार्य में ध्यान लगना आवश्यक है। संसार के जितने भी अविष्यकार हुये हैं वे सब ध्यान के माध्यम से ही हुये हैं। इससे सिद्ध होता है कि ध्यान ही उन्नति का मूल है। इसलिये हमें ध्यान अवश्य करना चाहिये, वैसे तो ध्यान हम कभी भी कर सकते हैं परन्तु प्रातःकाल का समय सर्वोत्तम होता है।

ध्यान लगाने के लिये स्नानादि क्रिया से निवृत्त होकर चित्रानुसार बैठ जायें। संभव हो तो पद्यमासान या वज्रासन की मुद्रा में बैठें तो अतिउत्तम है। अपने मस्तिष्क से आप हर एक बात धीरे-धीरे निकालते जायें। उसमे किसी प्रकार का विचार न रहने दें। आपके दिमांग में यह भी नहीं रहना चाहिये कि आप ध्यान कर रहे हैं। बस आपके दिमाग में जो भी विचार आते जायें उसे आप छोड़ते जायें। मस्तिक में भारीपन रहना ही नहीं चाहिये। वह एकदम हल्का होना चाहिये तभी ध्यान लग पायेगा। इस क्रिया को करने से आपके मस्तिष्क को अपूर्व आनन्द मिलेगा, जैसा आनन्द आपको कभी नही मिला होगा। यही ध्यान है। ध्यान लगाने की क्रिया में प्रारम्भिक असफलता से निराश नहीं होना चाहिये, यह सब धीरे-धीरे होता है। इस क्रिया को करते हुये जब आप इसके अभ्यस्त हो जायेंगे तो रास्ता चलते हुये या गाड़ी ड्राइव करते हुये आपका ध्यान स्वतः लग जायेगा। आपको अद्भुद आनन्द मिलेगा। इस प्रकार सध जाने पर आपके अनेक सांसारिक कार्य स्वतः ही होते जायेंगे। आर्थिक क्षेत्र में आपको अभूतपूर्व सफलता मिलेगी। आपका स्वास्थ्य भी उन्नत होता जायेगा। आप किसी भी धर्म या जाति के हैं, ध्यान कर सकते हैं। यह निराकार साधना है इसलिये सभी को ध्यान अवश्य करना चाहिये।

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