अजवाइन

अजवाइन

अजवाइन की खेती उत्तरी भारत के साथ साथ आन्ध््राप्रदेष और तमिलनाडु में की जाती है। इसके अतिरिक्त इसकी खेती ईरान, मिó और अफगानिस्तान में भी होती है। यह एक वार्शिकीय पौधा है, जो अक्टूबर-नवम्बर माह में बोया जाता है और मई-जून में इसकी फसल तैयार होती है। इसका बीज खाकी रंग का होता है, जो अजवाइन कहलाता है। इसका पादप एक से तीन फुट तक ऊँचा होता है। अजवाइन की प्रषंसा में कहा गया है- ‘एका यमानी षतमन्नपाचिका ‘ अर्थात अजवाइन अकेली ही सौ प्रकार के अन्न को पचाने वाली होती है।

यह अवेलीफेरी परिवार का सदस्य है और इसका वानस्पतिक नाम टेªकीेस्पर्मम एमी (लिन) है।
विभिन्न नाम – संस्कृत- यवनिका, अजमोद, हिंदी, पंजाबी और उर्दू- अजवाइन, मराठी- असेवा, बंगला- जीवान, मलयालम- ओमम, गुजराती- यावान, जवाइन, फारसी- नाबरब्बा, अंग्रेजी- अजोवान
गुण धर्म- आयुर्वेदानुसार अजवाइन, उश्णवीर्य, तीक्ष्ण, लघुपाक, अग्निवर्धक, गर्भाषयषोधक, पित्तवर्धक, पाचक, रूचिकर एवं वायुकफ तथा षुक्रनाषक है। अजीर्ण, अग्निमांध, प्लीहा, उदरी एंवम कृमिरोग में हितकारी है।

अजीर्ण मे भुनी अजवाइन का चूर्ण 05 ग्रा0 और संेधा नमक 02 ग्रा0 का मिश्रण जल के साथ देने से लाभ होता है। अजवाइन 05 ग्रा0, छोटी हड़ 05 ग्रा0, षुद्ध भुनी हींग 1/4 ग्रा0 और संेधा नमक 03 ग्रा0 का चूर्ण भी अजीर्ण मे लाभकारी होता है।अजवाइन, कालीमिर्च और कालानमक को समभाग लेकर उसका चूर्ण बनाकर गर्म जल से सेवन करने पर मंदाग्नि मे लाभ होता है। यह पेट र्दद मे भी हितकारी है। यह हुकवर्म की बहुत अच्छी दवा है। इसमे अजवाइन 03 ग्रा0 वायविडं़ग 03 ग्रा0, षुद्ध कपूर 01 ग्रा0, देषी गुड़ 05 इन ग्रा0 सबको मिलाकर गोली बना ले। इस गोली को दिन मे तीन बार जल के साथ सेवन करने पर हुकवर्म नश्ट होते है। अजवाइन का चूर्ण 05 ग्रा0 और संेधानमक मट्ठे के साथ लेने से कृमि नश्ट होते है।

खांसी और ष्वास रोग मे इसके चूर्ण को कागज की सिगरेट जैसी नलिका बनाकर उसमे भरकर उसका धूम्रपान कराते है। यह कार्य चिलम से भी होता है। इससे जमा बलगम बाहर निकलता है, और दुर्गन्ध दूर होती है। यह जीवाणु वृद्धि रोककर एंटीबायटिक का कार्य करता है।

व्यायाम अधिक करने के कारण या अन्य किसी कारणवष अत्याधिक थक जाने पर अजवाइन को गर्म पानी मे उबालकर उसके गुनगुने पानी से नहाने पर थकावट दूर होती है। इसके लिए अजवाइन को एक साफ सूती पतले कपड़े मे बांधकर पानी मे उबलने के लिये डाल दिया जाता है। यह पानी थकावट दूर करने के साथ-साथ एंटीबायटिक का भी कार्य करता है। इसी लिए प्रसवोपरान्त प्रसूता को नीम के जल के साथ इसके जल से भी नहलाया जाता है। यह भारत की प्राचीन परम्परा है।
षरीर मे कही घाव हो जाने पर अजवाइन के सत को गर्म जल मे मिलाकर धुलने से यह एंटीसेप्टिक का कार्य करता है। इस प्रकार अनेक प्रकार की दवाओ मे इसका प्रयोग होता है।
इसके अतिरिक्त यह पूड़ी, पराठे, मठरी, नमकपारा आदि नमकीन पदार्थो मे भी मिलाया जाता है। उश्णवीर्य होने के कारण इसका प्रयोग षीतऋतु मे अधिक होता है।

निशेध- अत्यधिक पित्तप्रधान गुण होने के कारण पित्तप्रधान रोगो मे एवम् पित्तप्रधान षरीर वालो को इसका सेवन नही करना चाहिए। यह मेरा अनुभूत है।

रासायनिक संघटन – जलांष- 8.08ः , प्रोटीन- 15.5ः, वसा ( इथर सार ) 18ः, कच्चा रेषा- 11.9ः , कार्बोहाइडेट- 38.6% , खनिज द्रव्य – 7.1ः , कैल्षियम 1.41% , फॉस्फोरस 0.30% , लौह 14.4% मि.ग्रा0/100 ग्रा0, कैलोरी मान प्रति 100 ग्रा0 379।
हमारे समूह द्वारा बड़े दाने की साफ अजवाइन का विक्रय होता है। इसके अतिरिक्त यह हमारे अचार मसाले मे भी प्रयुक्त होता है।

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